मेरठ के शिव स्थानों में श्रेष्ठ बागपत का पुरामहादेव मंदिर

भारत वर्ष में श्रावण मास को भगवान शंकर का महीना कहा जाता है। इस महीने में भगवान शिव की आराधना पूजा पूरे देश में शिव भक्त श्रद्धा के साथ करते हैं। शिव भक्त श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को शिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाकर भगवान शंकर की पूजा आराधना करते हैं। इसी क्रम में बागपत जनपद में भगवान परशुराम द्वारा स्थापित परशुरामेश्वर महादेव मन्दिर है जिसमें हरिद्वार से काँवड़ में गंगाजल लाकर श्रावन मास की त्रयोदशी को पुरामहादेव मंदिर में शिवलिंग को स्नान कराते हैं।
वर्तमान में परशुरामेश्वर महादेव (पुरामहादेव) निकट बनैली जनपद बागपत मेरठ मंडल में श्रावण-त्रयोदशी पर काँवड़ मेला लगता है। मेले में लगभग 30-40 लाख शिवभक्त हरिद्वार से काँवड़ में गंगाजल लाकर परशुरामेश्वर महादेव पर चढ़ाते हैं। इस प्रथा का प्रारंभ भगवान परशुराम से ही हुआ।

त्रेतायुग के प्रथम चरण में महर्षि जमदग्नि के यहाँ माता रेणुका के गर्भ से उत्पन्न भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में भगवान परशुराम ने अवतार लिया। भगवान परशुराम भार्गव वंश से थे। भगवान शिव के भक्त तो बहुत थे, किन्तु शिव ने अपना परम शिष्य केवल परशुराम को ही बनाया। शिव से उनको शस्त्रास्त्र विद्या एवं अनेक सिद्धियाँ प्राप्त थी, श्रीविद्या का प्रसाद भी भगवान परशुराम को शिव से ही प्राप्त हुआ था। भगवान परशुराम भी शिव के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। उनका नियम था कि जहाँ भी वे आर्यत्व प्रचार का अभियान चलाते थे, वहीं कार्य सिद्धि के लिए अथवा भक्ति भावनावश महादेव के प्रतीकों की स्थापना कर दिया करते थे। एशिया और यूरोप के अनेक देशों में महादेव के विशाल प्रतीक आज भी विद्यमान हैं। ये सब महादेव प्रतीक भगवान परशुराम द्वारा ही स्थापित किए गए हैं तथा आज भी उनकी स्मृति को ताज़ा कर रहे हैं।

भगवान परशुराम ने लगभग 10 वर्षो तक मध्य एशिया यूनान, रुस आदि दूसरे देशों में दिग्विजय एवम् आर्य-दर्शन संस्कृति का प्रसार कार्य चलाया। परशुराम अपने बल, पराक्रम और शौर्य से गान्धार (अफगानिस्तान) कश्यप भूमि (ईरान-ईराक) और्व (अरब) परसिमा (रूस) आदि देशों में चक्रवर्ती दिग्विजय करके भारत लौट आए। परशुराम की विजयवाहिनी ने कुछ दिन विश्राम के लिए मयराष्ट्र (वर्तमान मेरठ) और व्याघ्रपतन (वर्तमान बागपत) के मध्य उस स्थान पर अपनी सेना के शिविर स्थापित कर दिये, जहाँ से मय सेनाएँ विलीन (वर्तमान बनैली) हुईं थी और जहाँ थोड़ी दूर पर रणक्षेत्र में प्राण समर्पित करने वाले वयोवद्ध सैनिकों (वर्तमान पुरा महादेव) का अन्तिम संस्कार किया गया था।
परशुराम के अग्रज ‘बसु’ की सहमति से -दो-दो शुभ महान कार्य सम्पन्न हुए हैं-एक तो मयपुत्रों का राज्याभिषेक और दूसरे चक्रवर्ती दिग्विजय। इन सफलताओं के उपलक्ष्य में यदि इस स्थान पर विजय-यज्ञ किया जाए तो उत्तम होगा।

परशुराम ने यज्ञ प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया। परशुराम के दूसरे अग्रज बसुमान ने प्रस्ताव किया-प्रिय राम! (बड़े भ्राता परशुराम को ‘प्रिय राम’ ही पुकारा करते थे) हमें चक्रवर्ती दिग्विजय की सफलता परम प्रभु भगवान शिवशंकर की कृपा से प्राप्त हुई है, अत: इस स्थान पर यदि यज्ञोपरान्त धर्म विजय स्वरूप शिवलिंग की स्थापना भी हो जाए तो उत्तम रहेगा। परशुराम को महादेव स्थापना का प्रस्ताव भी अति उत्तम लगा। उन्होंने सहर्ष सहमति प्रकट की।

जब महर्षिंगणों को पता चला कि आर्यवर्त के मध्य स्थान पर भगवान् परशुराम की विजय सेना विश्राम के साथ-साथ महायज्ञ एवं महादेव-स्थापना का आयोजन कर रही है तो उन्हें अपार हर्ष हुआ।

हरिद्वार से ‘शिवलिंग’ हेतु पाषाण लाना

महायज्ञ सम्पन्न होने के उपरान्त तीन दिन के भीतर ‘शिवलिंग’ स्थापना हेतु गंगा माता के पावन जल से सद्यस्नात पाषाण लाकर प्राण-प्रतिष्ठा होनी थी, अत: दूसरे दिन प्रात: काल परशुराम तथा शिवभक्तगण शिव पाषाण गंगा माता से प्राप्त करने के लिए हरिद्वार प्रस्थान कर गए।

शिवभक्तों ने गंगा माता की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करने के उपरान्त शिवलिंग के लिए पाषाण चुनकर उठाने का प्रयत्न किया। किन्तु कोई भी पाषाण अपने स्थान से टस से मस न हुआ। यह देखकर भगवान् परशुराम चिन्तित हो उठे। उन्होंने नतमस्तक और करबद्ध होकर लोकपाविनी गंगा माँ से ‘शिवलिंग’ स्थापना हेतु पाषाण के लिए याचना की। गंगा माता मौन रही। परशुराम माँ गंगा से प्रार्थना करते रहे- हे विष्णुपदी ! हे शिवांगी ! हे माता भगीरथी! एक पाषाण दो। तुम्हारा अनुचर एक पाषाण के लिए याचना कर रहा है।
परशुराम की भक्ति भावना भरी प्रार्थना सुनकर गंगा माता का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने जल से ऊपर उठकर दर्शन दिये। परशुराम ने गंगा माता की स्तुति की और पुन: अपनी याचना दोहराई गंगा माता ने कहा- पुत्र परशुराम! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम जिस पाषाण को चाहते हो, ले लो।

पाषाणों की प्रार्थना

माँ गंगे का कथन सुनकर पाषाण विहृवल होकर समवेत स्वर में बोल उठे- माँ! हमें जाने की आज्ञा मत दो, हमें अपने से विलग मत करो, हम आपके ही शीतल चरणों में पड़े रहना चाहते है। पाषाण समूह की इस प्रकार की विनयपूर्ण प्रार्थना सुनकर परशुराम और पापविनाशिनी माँ गंगा आश्चर्यचकित रह गई।
गंगा बोली – हे प्रिय पाषाण पुत्रो! तुम परशुराम के साथ क्यों जाना नहीं चाहते? तुम्हारी ‘महादेव’ के रूप में पूजा-अर्चना होगी। शिवभक्त तुम्हारा श्रृंगार -आराधना करेंगे, फिर तुम्हे क्या आपत्ति हो सकती है?

यह सुनकर पाषाण बोले-‘हे जगतपावनी माँ गंगे! हमारी विनती सुनो- हम आपकी स्नेहमयी गोद में जन्में, पले और बड़े हुए है। आपका शीतल जल प्रतिदिन हमारी कठोर देह को सहला-सहला कर निर्मल बनाता है और हमारे हृदय को शान्ति देता है-स्नेह देता है। निरन्तर भोले बाबा की जटाओं से झरता हुआ, हिमालय के अंक में उपजी वनस्पतियों की सुगन्ध में रचा-बसा तुम्हारा यह अमृत तुल्य पावन गंगा जल माँ हमें अन्यत्र कहाँ मिलेगा? अत: ममतामयी माँ! अपने शिशुओं को अपने स्नेह-आँचल की शीतल छाया में पड़े रहने दो।
पाषाण पुत्रों की यह व्यथा सुनकर माँ गंगा का कंठ भर गया। वे मौन हो गई, उन्हें लगा कि जैसे ये पाषाण ठीक कह रहे हैं। परशुराम ने उनकी पीड़ा को पहचान लिया, समझ लिया और फिर वे कोमल वाणी में बोले- माँ गंगे! मैंने इन अग्रजों की पीड़ा को समझ लिया है। लोकपावनी आप मेरी जननी के समान हैं। आपका यह परशुराम आपको साक्षी मानकर यह वचन देता है कि प्रतिवर्ष फाल्गुन और श्रावण मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी पर मैं स्वयं अपने कंधे पर ‘काँवड़’ रखकर हरिद्वार से गंगाजल लाकर शिवलिंग का अभिषेक अपने हाथों से किया करूंगा तथा मेरे साथ ही लाखों भक्त बम-बम भोले का घोष करते हुए-ऊँ नम: शिवाय:’ महामंत्र को जपते हुए’ हरिद्वार से गंगा जल लेकर पुरामहादेव जाया करेंगे और वहां जल चढ़ाकर मन-इच्छित वर पाया करेंगे।

परशुराम का यह भक्ति भरा उद्घोष सुनकर पुण्य सलिला माँ गंगे तथा पाषाण संतुष्ट हो गए। परशुराम की ओर मंद मुस्कराते हुए माँ गंगा बोली-पुत्र परशुराम! मै तुम्हारे कथन को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हूँ तथा मेरे अंक में क्रीड़ा करने वाले ये पाषाण भी सन्तुष्ट हैं। हे भार्गव राम! मैं तो विष्णु के चरणों से निकला हुआ ब्रह्मद्रव हूँ पर आप तो साक्षात् श्री नरहरि के विशिष्टांश और शिवब्रह्मा के आराध्य हैं, अत: नाथ! मेरा नमन भी स्वीकार करें, अब जिस भी शिला को ‘शिवलिंग’ की स्थापना हेतु लेना चाहे सहर्ष ले लें। माँ भगीरथी के ये शब्द सुनते ही आकाश मण्डल से पुष्पों की वर्षा होने लगी। चारों ओर गंगा मैया की जय, भगवान परशुराम की जय, शिवशंकर की जय-ध्वनि से दशों दिशाएं गूँजने लगीं। परशुराम ने पुन: गंगा मैंया को नमन किया, भोले शंकर का मन ही मन स्मरण किया और काँवड़ मंगवाकर उसमें जल भरा कलश रखा और ब्रह्मणस्पति पूज्य प्रस्तर स्थापित करके मयराष्ट्र की ओर चल दिये। कुछ ही समय में वे शिवभक्तों के सहित वहाँ पहुँच गए जहाँ ऋषियों सहित सब शिवभक्त उनकी प्रतिक्षा कर रहे थे। उन्हें देखते ही सबने ‘जय परशुराम’, ‘जय भोलेनाथ’ का निनाद किया।

महर्षि वाल्मीकि के कर कमलों से महादेव शिवलिंग की हुई प्राण-प्रतिष्ठा

दूसरे दिन प्रात: काल भार्गव परशु राम ने ब्रह्मवेताओं, पुरोहितों एवं ऋषि-मुनियों को बुलाकर शुभ मुहूर्त में विधि विधान पूर्वक पूजन-अर्चन करके ‘शिवलिंग’ की प्राणप्रतिष्ठा महर्षि वाल्मीकि कें कर-कमलों से करवाई।

महादेव शिव का साक्षात् दर्शन देना

भगवान परशुराम ने महादेव शिवलिंग का अभिषेक गंगाजल से स्वयं अपने हाथों से किया। इस पुनीत अवसर पर महादेव ने साक्षात् दर्शन देकर परशुराम से कहा-हे जामदग्नेय राम! वैसे तो आप ही श्री नारायण के विशिष्ट अंश होने के कारण हम सब देवों के आराध्य हैं, किन्तु लोक में मेरे भक्त और शिष्य रूप में जिस प्रकार तुमने मुझे अनेक स्थानों में स्थापित करके जो सम्मान दिया है, इससे मैं तुमसे अत्यधिक प्रसन्न हूँ।

पूरे संसार में अगणित पूज्य स्थान हैं, किन्तु मेरी सबसे अधिक मान्यता, धर्मपरायण भारतवर्ष में ही रहेगी। पुण्य भारत भूमि सबसे अधिक प्रिय है, क्योंकि अन्य देश तो मनुष्य के देश हैं, परन्तु भारत भूमि मानवता की भूमि है। परशुराम! मानवता के कल्याण के लिए तुमने अनेक स्थानों पर द्वादशलिगों (शक्ति-पीठों) की स्थापना स्वयं अपने हाथों से पूर्ण भक्ति भावना के साथ की है। वे सभी पूज्यस्थल अत्यन्त पवित्र हैं, किन्तु उन सभी स्थलों से यह स्थल सर्वश्रेष्ठ और शीघ्र फल देने वाला, सबकी मनोकामना को पूर्ण करने वाला होगा।
रेणुकानन्दन राम! तुम नारायण का अंश होते हुए भी एक विनम्र सच्चे शिष्य के रूप में मुझे अपने कंधे पर बैठाकर हरिद्वार से यहाँ स्वयं लाए हो और स्वयं अपने हाथों से मेरा अभिषेक गंगाजल से करके मेरी यहाँ स्थापना की। अत: इस स्थान का महत्व अन्य सब शिव स्थानों से अधिक होगा।

मेरे आराध्य, जन-जन के उपास्य भार्गव राम! आपने यह भी प्रतिज्ञा की है कि मैं स्वयं प्रतिवर्ष अपने कधों पर काँवड़ लेकर यहाँ गंगाजल चढ़ाने आया करूँगा। मैं सब भक्तों और धरती को साक्षी मानकर यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं प्रतिवर्ष श्रावण मास के पुण्य अवसर पर दर्शन देने आया करूँगा। जो मेरे सच्चे भक्त इस अवसर पर काँवड़ चढ़ायेंगे उनकी सम्पूर्ण मनोकामनाएँ अवश्य पूर्ण होंगी।

भगवान शिव ने अन्त में अपने भक्तों से कहा-हे भक्तों आज से इस स्थान का नाम ‘परशुरामेश्वर महादेव’ होगा। कुछ भोले भक्त पुरामहादेव भी कहा करेंगे।