मेरठ का परिवार तीन पीढ़ियों से देश के लिए बना रहा है तिरंगा।

मेरठ में एक परिवार ऐसा है जो पुश्तैनि जमाने से तिरंगा सिलने का काम कर रहा है। परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य सुभाष नगर निवासी रमेशचदं गर्व से बताते हैं कि उनके बाबा ने ही वो तिरंगा सिला था, जो आजादी के बाद पेहली बार १५ अगस्त को लालकिले की प्राचीर से फेहराया गया था। रात को तिरंगा सिलने के बाद १५ अगस्त की तडके येह दिल्ली पहुंचाया गया था। रमेशचदं के अनुसार उनका परिवार अजादी के बाद से ही तिरंगे तैयार करता चला आ रहा है। सुभाषनगर निवासी लेखराज सिंघ ने और उनके निधन के बाद भाई नत्थे सिंघ ने और अब नत्थे सिंघ के निधन के बाद अब रमेशचंद ने इस पुश्तैनी काम की डोर सम्भाल रखी है।

बाबा ने बनाया था पहला झंडा’

रमेश चंद्र बताते हैं कि जिस दिन देश आजाद हुए उस दिन संसद भवन में तिरंगा झंडा का प्रस्ताव पास हुआ और इस झंडे को बनाने का काम उनके बाबा लेखराज सिंह को मिला। उनके बाबा ने रातों रात लालकिले पर फहराने के लिए तिरंगा तैयार किया जो सुबह चार बजे दिल्ली पहुंचाया गया था। उसके बाद वह झंडा लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने फहराया था।

तीन जगहों पर तैयार होता है तिरंगा :

रमेश चंद्र बताते हैं कि देश में सिर्फ तीन जगह तिरंगा बनाया जाता है। पहला कोलकाता, दूसरा मुबंई और तीसरा मेरठ में। मेरठ में गांधी आश्रम में झंडा बनाया जाता है। गांधी आश्रम में तिरंगा बना-बनाया मिलता है। इसको सिलने का काम साल 1947 से रमेश चंद्र का परिवार कर रहा है।

कश्मीर के लिए अतिरिक्त स्टॉक :

मेरठ में बने झंडे की सप्लाई कोलकाता, पंजाब, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली तक होती है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद पहली बार कश्मीर के लिए अतिरिक्त स्टॉक तैयार किया जा रहा है। इसके तहत करीब 2 से 3 हजार झंडे इस बार ऑन ऑर्डर जम्मू कश्मीर भेजे जाएंगे।

इन बातों का रखना होता है ध्यान :

रमेश चंद्र बताते हैं कि तिरंगा को बनाते समय कई बातों का पालन करना पड़ता है। ऐसा न करने पर तिरंगा का अपमान भी हो सकता है। इसलिए इसको सिलते समय बहुत सावधानी बरतनी होती है। मशीन पर सिलते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कहीं ये नीचे लटककर न गिर जाए। या फिर कोई इसके ऊपर से इसको लांघ कर न निकल जाए।

राष्ट्रीय ध्वज बनाने के नियम

रमेश के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज बनाने के अपने कई नियम है। सबसे पहला नियम तो इसकी सिलाई ही होती है। इनमें 12 से 16 सिलाई लगाई जाती है। बीच में भी सिलाई लगाई जाती है। संविधान के अनुसार इससे अधिक सिलाई राष्ट्रीय ध्वज में लगाना अपराध की श्रेणी में माना जाएगा। साथ ही यह तिरंगे का अपमान भी होगा।